
Last Updated:August 31, 2026, 14:44 IST
Bikaner Hindi News: प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक घोड़ों की उपयोगिता, नस्लों और इतिहास की जानकारी यहां आधुनिक तरीके से प्रदर्शित की गई है। घोड़ों की शौर्य गाथाओं से लेकर उनकी वैज्ञानिक जानकारी तक, संग्रहालय में कई पहलुओं को तस्वीरों और आकर्षक डिस्प्ले के माध्यम से समझाया गया है. देशी और विदेशी पर्यटक यहां घोड़ों की विभिन्न प्रजातियों और उनके इतिहास से रूबरू होते है.
अश्व संग्रहालय में लगा यह आकर्षक डिस्प्ले भारत में पाई जाने वाली घोड़ों की प्रमुख नस्लों की जानकारी देता है. नक्शे के माध्यम से बताया गया है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कौन-कौन सी नस्ल के घोड़े पाए जाते हैं. भारत में मणिपुरी, मारवाड़ी, भूटिया, स्पीति, काठियावाड़ी, झंसकारी, सिंधी और भीमथड़ी जैसी प्रमुख नस्लों को मान्यता दी गई है. संग्रहालय में इन नस्लों की पहचान, विशेषताओं और उनके भौगोलिक क्षेत्र के बारे में जानकारी दी गई है.
राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के अश्व संग्रहालय में घोड़ों की नस्लों और उनके इतिहास को बेहद आकर्षक तरीके से प्रदर्शित किया गया है. दीवारों पर लगे बड़े-बड़े डिस्प्ले और तस्वीरें दर्शकों को घोड़ों की दुनिया की पूरी जानकारी देते हैं. यहां ऐतिहासिक घोड़ों से लेकर विभिन्न नस्लों और उनके उपयोग तक के बारे में बताया गया है. संग्रहालय में घोड़ों से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों को भी सरल भाषा और आधुनिक प्रस्तुति के जरिए समझाया गया है.
अश्व संग्रहालय में घोड़ों से जुड़े शोध और वैज्ञानिक जानकारी को भी प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है. दीवारों पर लगे पोस्टर और डिस्प्ले घोड़ों की नस्ल, रोग, पालन-पोषण और उनके व्यवहार से जुड़ी अहम जानकारियां साझा करते हैं. राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में देश-विदेश से वैज्ञानिक शोध के लिए आते हैं और उच्च नस्ल के अश्वों व गर्दभों पर विभिन्न प्रयोग किए जाते हैं. संग्रहालय में इन शोध कार्यों की झलक भी देखने को मिलती है.
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भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में अश्व और गदर्भका विशेष महत्व रहा है. अश्व संग्रहालय में प्रदर्शित यह जानकारी इसी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है. पौराणिक कथाओं में सूर्य देव के सात घोड़ों का उल्लेख मिलता है, वहीं न्याय के देवता गोलू देवता को अश्व की सवारी करते हुए दिखाया जाता है. शीतला माता का वाहन गदर्भ माना गया है. इसके अलावा तेजाजी महाराज, रामदेवजी और अश्विनी कुमारों का संबंध भी घोड़ों से जुड़ा हुआ है.
अश्व संग्रहालय में घोड़ों की ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विरासत को एक साथ प्रस्तुत किया गया है. यहां देश की प्रमुख घोड़ा नस्लों के साथ-साथ उन घोड़ों की जानकारी भी दी गई है, जिन्होंने इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई. महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक से लेकर विभिन्न ऐतिहासिक शासकों और योद्धाओं के घोड़ों की विशेषताओं को संग्रहालय में दर्शाया गया है.
अश्व संग्रहालय में घुड़सवारी से जुड़े पारंपरिक उपकरणों को भी खास जगह दी गई है. दीवार पर टंगे लगाम, चाबुक और अन्य साजो-सामान घुड़सवारी की पुरानी परंपरा की झलक दिखाते हैं. ये उपकरण बताते हैं कि घोड़े और घुड़सवार के बीच संबंध केवल सवारी तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक पूरी कला और अनुशासन जुड़ा हुआ था. संग्रहालय में आने वाले दर्शकों को यह समझने का मौका मिलता है कि एक घुड़सवार के लिए किन-किन वस्तुओं की आवश्यकता होती थी.
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August 31, 2026, 14:44 IST
